*मुक्त-मुक्तक : 721 - क़ाफ़िला-दर-क़ाफ़िला ॥


रंगीं-महफ़िल , लाव-लश्कर , क़ाफ़िला-दर-क़ाफ़िला ॥
इसमें क्या शक़ मैंने जो चाहा मुझे अक्सर मिला ॥
फिर भी मेरी अपनी भरसक कोशिशों का तो नहीं ,
मुझको लगता है कि बस क़िस्मत का ही है यह सिला ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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