*मुक्त-मुक्तक : 720 - रीते पड़े यहाँ मन ॥


जाने कितनी ही भर्तियाँ
होती हैं सन्-प्रति-सन् ॥
भाँति-भाँति की रिक्तियों के हैं
होते विज्ञापन ॥
क्यों किसी का ध्यान जाता
 ही नहीं इस ओर
जाने कबसे , कितने ही
रीते पड़े यहाँ मन ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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