*मुक्त-मुक्तक : 719 - आँच से अंगार........


धैर्य - करि , बन मत्त दादुर - 
दल उछल बैठे ॥
स्निग्ध - पथ पर नोक - डग कल 
चल फिसल बैठे ॥
बिन छुए तुझको तेरी बस 
आँच से अंगार ,
कितने लोहे मोम - सदृश 
गल - पिघल बैठे ॥
( धैर्य-करि=संयम के हाथी,मत्त=मतवाला,दादुर-दल=मेंढक समूह,स्निग्ध-पथ=चिकनी राह ,नोक-डग=नुकीले क़दम )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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