*मुक्त-मुक्तक : 717 - कतरन ही तो माँगी थी....


इक कतरन ही तो माँगी थी पूरा थान नहीं ॥
चाही थी बस एक पंखुड़ी पुष्पोद्यान नहीं ॥
पर तुम इक जीरा भी भूखे ऊँट को दे न सके ,
तुमसा कंगला हो सकता दूजा धनवान नहीं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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