*मुक्त-मुक्तक : 715 - टाँगों की ज़िद में ज़िंदगी......


पिघली भी होके साँचे में 
ढाले नहीं ढली !!
लकड़ी यों तर-ब-तर थी कि 
जाले नहीं जली !!
आँखें थीं ,कान थे ,थे हाथ ,
नाक भी मगर
टाँगों की ज़िद में ज़िंदगी 
चाले नहीं चली !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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