*मुक्त-मुक्तक : 711 - जुगनू हज़ार दो ॥


टिम-टिम चिराग़ एक या जुगनू हज़ार दो ॥
हंसों सा दो प्रकाश कि पिक-अंधकार दो ॥
वाबस्ता जो नज़र से वो किस काम का मेरे ?
अंधा हूँ मैं मुझे क्या शब दो या नहार दो ॥
( वाबस्ता=सम्बद्ध , नहार=प्रभात )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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