*मुक्त-मुक्तक : 709 - कैसे हम परिंदा थे ?


जाने कितनों में अजीब
और हम चुनिंदा थे ?
उम्र भर फड़फड़ा ,
घिसट-घिसट भी ज़िंदा थे ॥
तोड़ पिंजरा सके न ,
चल सके न , उड़ न सके –
पैर थे , पर थे , हाय !
कैसे हम परिंदा थे ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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