नवगीत : 36 - जीवन - चाय...........




बहुत बेस्वाद , केवल गर्म पानी और अति फीकी ॥
लगा होंठ अपने मेरी कर दो जीवन-चाय तुम मीठी ॥
रहे तुम भी अछूते औ हृदय मेरा रहा रीता ।
समय दोनों का जो एकांत के सान्निध्य में बीता ।
कि अब जब आ गए मेले में तो मेरे निवेदन की -
करो स्वीकार पहली और अंतिम प्रेम की चीठी ॥
पहाड़ों से खड़े पैरों को गति औ लास्य मिल जाए ।
निरंतर चुप पड़े होठों को स्वर औ हास्य मिल जाए ।
तुम्हारे हाथ में है , हाथ मेरा थाम लो यदि तुम –
कि मुझ अंधे को मिल जाएगा कोई लक्ष्य या वीथी ॥
( चीठी=पत्र लास्य=नृत्य ,वीथी=मार्ग )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Asha Saxena said…
उम्दा है |
बहुत खूब , शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन
कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
http://madan-saxena.blogspot.in/
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धन्यवाद ! Madan Mohan Saxena जी !

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