164 : मुक्त ग़ज़ल - जी रहा हूँ ॥


ज़ख़्म कर कर के उन्हे
ख़ुद सी रहा हूँ  ॥
अश्क़ का दर्या बहाकर
पी रहा हूँ ॥
कुछ न पूछो हो गया क्यों
छाछ से बद ?
मैं जो उम्दा से भी उम्दा
घी रहा हूँ ॥
उनकी नज़रों में कभी
इक वक़्त था जब ,
मैं ख़ुदा से भी कहीं
आली रहा हूँ ॥
मुझको मत बतलाओ वह
कैसी जगह है ?
तुम जहाँ पर हो कभी
मैं भी रहा हूँ ॥
ज़िंदगी अपनी न अब वो
रह गए हैं ,
इसलिए तो उनके बिन भी
जी रहा हूँ ॥
वो जहाँ भी हैं ज़मीं या
आस्माँ पर ,
लेकिन उनका रहनुमा
मैं ही रहा हूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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