163 : मुक्त ग़ज़ल - काँव-काँव अपने ॥


लगते हैं सबको अच्छे 
कैसे हों ठाँव अपने ?
प्यारे ,बुरे भी हों तो ,
लगते हैं गाँव अपने ॥
मंज़िल अगर नहीं हो
 तो आज ही बना लो ,
या आज ही कटाकर 
रख डालो पाँव अपने ॥
जबसे दिया है उसके 
हाथों में हमने सूरज ,
तब से उसी के बस में 
हैं धूप-छाँव अपने ॥
कोयल को ही इजाज़त 
है याँ पे बोलने की ,
चुपवाओ करते कौए 
तुम काँव-काँव अपने ॥
जब जीतते नहीं तो 
क्यों खेलते जुआ हो ?
क्या हारने लगाते 
हर बार दाँव अपने ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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