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Showing posts from May, 2015

*मुक्त-मुक्तक : 721 - क़ाफ़िला-दर-क़ाफ़िला ॥

रंगीं-महफ़िल , लाव-लश्कर , क़ाफ़िला-दर-क़ाफ़िला ॥ इसमें क्या शक़ मैंने जो चाहा मुझे अक्सर मिला ॥ फिर भी मेरी अपनी भरसक कोशिशों का तो नहीं , मुझको लगता है कि बस क़िस्मत का ही है यह सिला ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 720 - रीते पड़े यहाँ मन ॥

जाने कितनी ही भर्तियाँ होती हैं सन्-प्रति-सन् ॥ भाँति-भाँति की रिक्तियों के हैं होते विज्ञापन ॥ क्यों किसी का ध्यान जाता  ही नहीं इस ओर – जाने कबसे , कितने ही रीते पड़े यहाँ मन ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 719 - आँच से अंगार........

धैर्य - करि , बन मत्त दादुर -  दल उछल बैठे ॥ स्निग्ध - पथ पर नोक - डग कल  चल फिसल बैठे ॥ बिन छुए तुझको तेरी बस  आँच से अंगार , कितने लोहे मोम - सदृश  गल - पिघल बैठे ॥ ( धैर्य-करि=संयम के हाथी,मत्त=मतवाला,दादुर-दल=मेंढक समूह,स्निग्ध-पथ=चिकनी राह ,नोक-डग=नुकीले क़दम ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

164 : मुक्त ग़ज़ल - जी रहा हूँ ॥

ज़ख़्म कर कर के उन्हे ख़ुद सी रहा हूँ  ॥ अश्क़ का दर्या बहाकर पी रहा हूँ ॥ कुछ न पूछो हो गया क्यों छाछ से बद ? मैं जो उम्दा से भी उम्दा घी रहा हूँ ॥ उनकी नज़रों में कभी इक वक़्त था जब , मैं ख़ुदा से भी कहीं आली रहा हूँ ॥ मुझको मत बतलाओ वह कैसी जगह है ? तुम जहाँ पर हो कभी मैं भी रहा हूँ ॥ ज़िंदगी अपनी न अब वो रह गए हैं , इसलिए तो उनके बिन भी जी रहा हूँ ॥ वो जहाँ भी हैं ज़मीं या आस्माँ पर , लेकिन उनका रहनुमा मैं ही रहा हूँ ॥

नवगीत : 36 - जीवन - चाय...........

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बहुत बेस्वाद , केवल गर्म पानी और अति फीकी ॥ लगा होंठ अपने मेरी कर दो जीवन-चाय तुम मीठी ॥ रहे तुम भी अछूते औ’ हृदय मेरा रहा रीता । समय दोनों का जो एकांत के सान्निध्य में बीता । कि अब जब आ गए मेले में तो मेरे निवेदन की - करो स्वीकार पहली और अंतिम प्रेम की चीठी ॥ पहाड़ों से खड़े पैरों को गति औ’ लास्य मिल जाए । निरंतर चुप पड़े होठों को स्वर औ’ हास्य मिल जाए । तुम्हारे हाथ में है , हाथ मेरा थाम लो यदि तुम – कि मुझ अंधे को मिल जाएगा कोई लक्ष्य या वीथी ॥ ( चीठी=पत्र, लास्य=नृत्य ,वीथी=मार्ग ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 718 - बेसबब ही.........

निगाहों में लिए फिरते हैं उसकी शक़्ल यारों ॥ नहीं करती हमारी काम कुछ भी अक़्ल यारों ॥ किया जिस दिन से उसने बेसबब ही हमको अपने - पकड़के दिल में कुछ दिन रखके फिर बेदख़्ल यारों ॥ - डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 717 - कतरन ही तो माँगी थी....

इक कतरन ही तो माँगी थी पूरा थान नहीं ॥ चाही थी बस एक पंखुड़ी पुष्पोद्यान नहीं ॥ पर तुम इक जीरा भी भूखे ऊँट को दे न सके , तुमसा कंगला हो सकता दूजा धनवान नहीं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 716 - बिना पिये ही चढ़ी......

बग़ैर ज़ीना  बलंदी गले लगा चूमी !! गली हर एक  चले बिन ही जन्नती घूमी !! वो आके बैठ गए क्या  ज़रा सा पहलू में , बिना पिये ही चढ़ी  ज़िंदगी नची-झूमी !! ( ज़ीना=सीढ़ी ,बलंदी=ऊँचाई ,जन्नती=स्वर्ग की ,पहलू=गोद ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 715 - टाँगों की ज़िद में ज़िंदगी......

पिघली भी होके साँचे में  ढाले नहीं ढली !! लकड़ी यों तर-ब-तर थी कि  जाले नहीं जली !! आँखें थीं ,कान थे ,थे हाथ , नाक भी मगर टाँगों की ज़िद में ज़िंदगी  चाले नहीं चली !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

163 : मुक्त ग़ज़ल - काँव-काँव अपने ॥

लगते हैं सबको अच्छे  कैसे हों ठाँव अपने ? प्यारे ,बुरे भी हों तो , लगते हैं गाँव अपने ॥ मंज़िल अगर नहीं हो  तो आज ही बना लो , या आज ही कटाकर  रख डालो पाँव अपने ॥ जबसे दिया है उसके  हाथों में हमने सूरज , तब से उसी के बस में  हैं धूप-छाँव अपने ॥ कोयल को ही इजाज़त  है याँ पे बोलने की , चुपवाओ करते कौए 

*मुक्त-मुक्तक : 714 - कच्ची मदी हूँ ॥

ओस कण दिखता हूँ पर  बहती नदी हूँ ॥ रूप से अंगूर सच  कच्ची मदी हूँ ॥ दृष्टिकोण अपना बदल लो  पाओगे फिर , एक छोटा पल नहीं मैं  इक सदी हूँ ॥ ( मदी = शराब ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 713 - मियादी सी आशिक़ी

मुझपे पहले ही ये बात  उसने साफ़ कर दी थी ॥ ख़ास शर्तों पे  मियादी सी आशिक़ी की थी ॥ ग़म नहीं आज अगर  ग़ैर वो हुआ , उसने – उम्र भर मेरा ही रहने की  कब क़सम ली थी ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 712 - बल्ब के काँच से पतले.....

नाम ठोकर का भी ले दो  तो टूट जाते हैं ॥ बल्ब के काँच से पतले  वो फूट जाते हैं ॥ जब भी मिलते हैं किया  करते बात मरने की , और दे दो जो इजाज़त  तो रूठ जाते हैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति


*मुक्त-मुक्तक : 711 - जुगनू हज़ार दो ॥

टिम-टिम चिराग़ एक या जुगनू हज़ार दो ॥ हंसों सा दो प्रकाश कि पिक-अंधकार दो ॥ वाबस्ता जो नज़र से वो किस काम का मेरे ? अंधा हूँ मैं मुझे क्या शब दो या नहार दो ॥ ( वाबस्ता=सम्बद्ध , नहार=प्रभात ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति