*मुक्त-मुक्तक : 702 - बस तुम ही मुब्तसिम !


इक लफ़्ज़ ग़म के नाम का नहीं ज़बान पर ॥

आँखेँ भी दिखाई न दें कभी भी तर-ब-तर ॥

इस आलमे अश्क़ अफ़्साँ में बस तुम ही मुब्तसिम !

सचमुच हो शादमाँ कि सिर्फ़ आओ तुम नज़र ?

( आलमे अश्क़ अफ़्साँ=रोने वाला संसार ,मुब्तसिम=मुस्कुराने वाला ,शादमाँ=आनंदित ,सुखी )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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