*मुक्त-मुक्तक : 701 -तुझमें ख़राबी है ॥



फ़क़त इक ही 
मगर 
सबसे बड़ी 
तुझमें ख़राबी है ॥
ज़रा रुक ! 
सुन ! 
तुझे रहती हमेशा 
क्यों शिताबी है ?
सुनें क्यों 
होश वाले 
होश की बातें 
तेरी बतला ?
कि जब 
बदनाम तू 
इस शह्र में 
ख़ालिस शराबी है ॥
( फ़क़त=मात्र ,शिताबी=शीघ्रता , शह्र=नगर ,ख़ालिस=केवल और केवल )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (19-04-2015) को "अपनापन ही रिक्‍तता को भरता है" (चर्चा - 1950) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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