*मुक्त-मुक्तक : 699 - नहीं रहता हूँ मैं अब होश में ?


मुझसी ग़फ़्लत तो नहीं होगी किसी मयनोश में ॥
पूछिए तो क्यों नहीं रहता हूँ मैं अब होश में ?
भागते थे जो मेरे साये से भी वो आजकल ,
बैठते हैं ख़ुद--ख़ुद आकर मेरी आगोश में ॥
( ग़फ़्लत=बेहोशी ,मयनोश =मदिरा-प्रेमी )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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