*मुक्त-मुक्तक : 697 - मैं ग़ज़ल कहता हूँ ॥


क़िला किसी को , किसी को मैं महल कहता हूँ ॥
किसी को चाँद , किसी रुख़ को कमल कहता हूँ ॥
सुने न ग़ौर से अल्फ़ाज़ मेरे ,कान उनके –
बड़े ही शौक से फिर भी मैं ग़ज़ल कहता हूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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