*मुक्त-मुक्तक : 695 - संगमरमर का महल ?


घोर पतझड़ में भी वह क्यों खिल रहा है दोस्तों ?
क्या उसे अभिवांछित सब मिल रहा है दोस्तों ?
हो गया वह आज कैसे संगमरमर का महल ?
जो कि कल तक माँद या इक बिल रहा है दोस्तों !
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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