*मुक्त-मुक्तक : 688 - तारे गिन-गिन रात-रात भर


तारे गिन-गिन रात-रात भर 

अपलक जगा रहा ॥

अर्थहीन कर्मों के पीछे 

भागा लगा रहा ॥

पर यथार्थ उत्तरदायित्वों-

कर्तव्यों से सदा ,

आँख चुराता रहा निरंतर 

बचता भगा रहा ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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