162 : मुक्त-ग़ज़ल - आईना पारा वाला.........



आईना पारा वाला बंदर का देख ॥
हैराँ हूँ शीशे का घर पत्थर का देख ॥
बाहर से वह लगती गंगा-जमुना ठीक ,
उसको पाया इक नाली अंदर का देख ॥
इतना अलसाया था मैं जा लेटा सच ,
रंच न घबराया बिस्तर खंजर का देख ॥
कुछ तो राज़ है वरना भूखा शेर यूँ ही ,
क्यों हम्लावर ना हो झुण्ड बक़र का देख ?
( बक़र = गाय , बैल )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


Comments

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बृहस्पतिवार (23-04-2015) को "विश्व पृथ्वी दिवस" (चर्चा अंक-1954) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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विश्व पृथ्वी दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति
कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
धन्यवाद ! Madan Mohan Saxena जी !

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