Posts

Showing posts from April, 2015

*मुक्त-मुक्तक : 705 - ग़म बड़े मिले ॥

बैठे कहीं , कहीं - कहीं  खड़े-खड़े मिले ॥ कुछ ख़ुद ख़रीदे  कुछ नसीब में जड़े मिले ॥ तिल-राई ज़िंदगी में  ताड़ औ’ पहाड़ से , हँस-रो के ढोने दिल के सर को  ग़म बड़े मिले ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 704 - सचमुच आरामदेह है.......

नर्म गद्दे पे छाई
नर्म रेशमी चद्दर ॥
सचमुच आरामदेह है
बहुत मेरा बिस्तर ॥
चूर थककर हूँ
नींद भी भरी है आँखों में,
फिर सबब क्या है
जो मैं बदलूँ करवटें शब भर?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
<

*मुक्त-मुक्तक : तन-मन में भर दे आग.......

अधि, अद्वितीय, अतुलनीय अरु अनूप से ॥ तन-मन में भर दे आग ऐसे त्रिय-स्वरूप से ॥ स्वस्तित्व की रक्षार्थ बर्फ-ब्रह्मचारियों , बचना सदैव जलती-चिलचिलाती धूप से ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 703 - ऐश-ओ-आराम की चाहत.....

ऐश-ओ-आराम की चाहत अज़ाब से पूरी , आब-ए-ज़मज़म की ज़रूरत शराब से पूरी , तुझको बतलाएँ क्या कि कैसे-कैसे की हमने ? आह ! तेरी तलब हमेशा ख़्वाब से पूरी ! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

162 : मुक्त-ग़ज़ल - आईना पारा वाला.........

Image
आईना पारा वाला बंदर का देख ॥ हैराँ हूँ शीशे का घर पत्थर का देख ॥ बाहर से वह लगती गंगा-जमुना ठीक , उसको पाया इक नाली अंदर का देख ॥ इतना अलसाया था मैं जा लेटा सच , रंच न घबराया बिस्तर खंजर का देख ॥ कुछ तो राज़ है वरना भूखा शेर यूँ ही , क्यों हम्लावर ना हो झुण्ड बक़र का देख ? ( बक़र = गाय , बैल ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : ये पचहत्तरवाँ साल है ॥

वज़्नी ज़ईफ़ी में भी  जवाँ ये मलाल है ॥ उनसे जुदाई का ये पचहत्तरवाँ साल है ॥ कुछ और रहे याद न इस सिन में पर उनका , हर वक़्त जेह्नो दिल में बराबर ख़याल है ॥ ( वज़्नी ज़ईफ़ी=भारी बुढ़ापा ,मलाल=दुःख ,सिन=उम्र ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 702 - बस तुम ही मुब्तसिम !

इक लफ़्ज़ ग़म के नाम का नहीं ज़बान पर ॥
आँखेँ भी दिखाई न दें कभी भी तर-ब-तर ॥
इस आलमे अश्क़ अफ़्साँ में बस तुम ही मुब्तसिम !
सचमुच हो शादमाँ कि सिर्फ़ आओ तुम नज़र ?
( आलमे अश्क़ अफ़्साँ=रोने वाला संसार ,मुब्तसिम=मुस्कुराने वाला ,शादमाँ=आनंदित ,सुखी )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

161 : मुक्त-ग़ज़ल - छुपाने की कोशिश ॥

नुमूदार को ना दिखाने की कोशिश ॥ दिखाने की है सब छुपाने की कोशिश ॥ ये क्या है अड़ा टाँग पहले गिराकर , बहुत प्यार से फिर उठाने की कोशिश ? ये दे के क़सम तुमको हम ना भुलाएँ , हमें याद कर-कर भुलाने की कोशिश ॥ कि दफ़्तर में अफ़सर की हर मातहत को , पले बंदरों सा नचाने कि कोशिश ॥ वो तालीम क्या जिसमें बचपन से बच्चों को , होती है बूढ़ा बनाने की कोशिश ? ( नुमूदार=प्रकट ,तालीम=शिक्षा ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 701 -तुझमें ख़राबी है ॥

Image
फ़क़त इक ही  मगर  सबसे बड़ी  तुझमें ख़राबी है ॥ ज़रा रुक !  सुन ! तुझे रहती हमेशा  क्यों शिताबी है ? सुनें क्यों  होश वाले  होश की बातें  तेरी बतला ? कि जब  बदनाम तू  इस शह्र में  ख़ालिस शराबी है ॥ ( फ़क़त=मात्र ,शिताबी=शीघ्रता , शह्र=नगर ,ख़ालिस=केवल और केवल )

*मुक्त-मुक्तक : 700 - फ़ौलाद मोम सा पिघले ॥

कभी जो बर्फ़ में फ़ौलाद मोम सा पिघले ॥ ग़ज़ाल शेर को ज़िंदा पटक उठा निगले ॥ भुला चुका हूँ उन्हें तुम ये मानना उस दिन , कि जिस भी दिन न मेरी आँख से दर्या निकले ॥ ( ग़ज़ाल=हिरण का बच्चा , दर्या=नदी ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 699 - नहीं रहता हूँ मैं अब होश में ?

मुझसी ग़फ़्लत तो नहीं होगी किसी मयनोश में ॥ पूछिए तो क्यों नहीं रहता हूँ मैं अब होश में ? भागते थे जो मेरे साये से भी वो आजकल , बैठते हैं ख़ुद-ब-ख़ुद आकर मेरी आगोश में ॥ ( ग़फ़्लत=बेहोशी ,मयनोश =मदिरा-प्रेमी ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 698 - मैं फ़क़ीर हुआ ॥

वो मुझसे तब कहीं ज़रा  असर-पज़ीर हुआ ॥ अमीर-ऊमरा से जबकि  मैं फ़क़ीर हुआ ॥ किया तभी है उसने मुझको  दिल में क़ैद अपने , जब उसकी ज़ुल्फ़ का मैं  बेतरह असीर हुआ ॥ ( असर-पज़ीर=प्रभावित ,अमीर-ऊमरा=धनवान ,असीर=क़ैदी ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

अकविता (15) - सारे फ़साद की जड़ है फ़ुर्सत ।

     कवच      होते हैं वार से बचने को ,      मरीजों के लिए होते हैं      डॉक्टर , अपराधों की रोकथाम अथवा न्याय के लिए हैं – पुलिस और अदालतें    बिगड़ों के लिए सुधारक    अज्ञानियों हेतु –  स्कूल और कॉलेज      यह लिस्ट और भी लंबी खींची जा सकती है -      किन्तु मेरा सिर्फ इतना कहना है कि      हम क्यों यह चाहते हैं कि