*मुक्त-मुक्तक : होली के हीले मुझको.......


होली के हीले मुझको 
बिरले ही ढंग से ॥
तज सप्त-वर्ण रँगना 
उसे अपने रंग से ॥
सोचूँ उसे न फिर भी 
हो उज्र कुछ भी जो –
गोली सा जा के उसके 
लग जाऊँ अंग से ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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