*मुक्त-मुक्तक : 686 - और नहीं कुछ प्राण था वो


उसको क्षण भर 
विस्मृत करना 
संभव नहीं हुआ ॥
प्रतिपल हृद ही 
हृद रोने से 
टुक रव नहीं हुआ ॥
और नहीं कुछ 
प्राण था वो पर 
उसके बिन सोचो !
होगी कितनी 
लौह-विवशता 
जो शव नहीं हुआ ?
[ हृद ही हृद = दिल ही दिल में , टुक रव = थोड़ा सा भी शोर ]
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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आपकी इस उत्कृष्ट रचना का उल्लेख कल सोमवार (30-03-2015) की चर्चा "चित्तचोर बने, चित्रचोर नहीं" (चर्चा - 1933) पर भी होगा.
सूचनार्थ
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (31-03-2015) को "क्या औचित्य है ऐसे सम्मानों का ?" {चर्चा अंक-1934} पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद ! अनूषा जैन जी !

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