*मुक्त-मुक्तक : 685 - इक अहा.........


इक अहा सौ आहों के 
भरने के बाद ॥
हिम सी यदि ठंडक मिले
जरने के बाद ॥
ऐसी आहा ऐसी 
शीतलता है यों –
फिर से ज्यों जी जाए 
जिव मरने के बाद ॥
[ जरने=जलना ,जिव=जीव ]
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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