*मुक्त-मुक्तक : 684 – सच.............


सच न केवल दृगपटल में ही अवस्थित है ॥
अपितु मन के तल में भी अब वह प्रतिष्ठित है ॥
उसकी ही संप्राप्ति अंतिम ध्येय जीवन का -
दूसरा कोई न मेरा लक्ष्य निश्चित है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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नवरात्रों की हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (28-03-2015) को "जहां पेड़ है वहाँ घर है" {चर्चा - 1931} पर भी होगी!
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सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद ! प्रतिभा सक्सेना जी !
धन्यवाद ! abhishek shukla जी !

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