*मुक्त-मुक्तक : 683 - मैं सब कुछ हो..........


मैं सब कुछ हो 
मगर उनकी 
नज़र में कुछ नहीं था !!
हो ऊँचा आस्माँ 
लगता उन्हें  
नीची ज़मीं था !!
कहा करते थे 
वो तब भी 
मुझे बदशक्ल-
बदसूरत ,
ज़माना जब 
मुझे सारा 
कहा करता 
हसीं था !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 


Comments

Aradhana Rai said…
nazer dekhti hai asma kaise kaise, anupam kriti.



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