*मुक्त-मुक्तक : 681 - अदा उम्र भर फर्ज़ हमने किये.....


कभी भूलकर ना 
किसी को ज़रा भी 
कोई चोट पहुँचाई 
और ना रुलाया ॥
अदा उम्र भर फर्ज़ 
हमने किये और 
हर इक क़र्ज़ मयसूद 
हमने चुकाया ॥
यही इक गुनह हमसे 
बेशक़ हुआ है कि 
मस्रूफ़ियत की 
वजह चाहकर भी ,
न मस्जिद में जाकर 
नमाजें पढ़ीं और न 
मंदिर में जाकर 
कभी सिर झुकाया ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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