*मुक्त-मुक्तक : 679 - कभी दूर से...........


ये कहने का मुझसे 
सम्हलकर चलाकर /
कभी दूर से तो 
कभी पास आकर /
मैं पूछूँ ज़माने से 
क्या हक़ है उनको -
जो चलते हैं ख़ुद 
लड़खड़ा-लड़खड़ाकर ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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