नवगीत (30) - केवल क़द-काठी तक मेरा हृदय आँकते हो


पेड़ हरा औ भरा भी सूखी 
डाली सा लगता ॥
इक तू न हो तो सारा मेला 
खाली सा लगता ॥
तू जो चले सँग तो काँटों की 
चुभन भली लगती ।
तू जो साथ खाए तो नीम 
मिसरी की डली लगती ।
तुझ बिन अपनी ईद मुहर्रम
 जैसी होती है –
तू हो तो होलिका-दहन 
दीवाली सा लगता ॥
झर-झर बहती रहतीं , रहतीं 
तनिक नहीं सूखी ।
जब तेरे दर्शन को अँखियाँ 
हो जातीं भूखी ।
मुझको थाल सुनहरा लगने 
लगता है सूरज –
चाँद चमकती चाँदी वाली 
थाली सा लगता ॥
केवल क़द-काठी तक मेरा 
हृदय आँकते हो ।
रहन-सहन पहनावा भी तुम 
व्यर्थ झाँकते हो ।
मेरे तल तक पहुँचो फिर 
गहराई बतलाना –
नील-गगन से नद भी उथली 
नाली सा लगता ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (09-03-2015) को "मेरी कहानी,...आँखों में पानी" { चर्चा अंक-1912 } पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद ! मयंक जी !
बेहद अच्‍छी रचना।
धन्यवाद ! कहकशाँ खान जी !

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