नवगीत (29) - उसके साथ खेलकर होली.....


उसके साथ खेलकर होली
आज तृप्त मन को करना है ॥
जिसको बिन पूछे मैं अपना
श्वेत-धवल मन दे बैठा ।
और रँगा इतना उसके रँग
इंद्रधनुष ही बन बैठा ।
अपने सप्त रँगों से उसके
वर्ण-सिक्त मन को करना है ॥
मैं उसमें ऐसा ही फैलूँ
जैसी वह मुझमें व्यापे ।
या मैं उसको कर दूँ विस्मृत
या वह भी मुझको जापे ।
भूल एक पक्षीय कभी ना
प्रेम-क्षिप्त मन को करना है ॥
जिसकी याद हृदय में सावन-
जेठ हरी ही रहती है ।
नीले सागर सी जो मन में
सदा भरी ही रहती है ।
बूँद-बूँद उसकी उलीचकर
पूर्ण-रिक्त मन को करना है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Aradhana Rai said…
kahte hai sataye sunder hota hai priye hota hai tabhi sab shiv hota hai aap ki kavitaye usi sunderta ka bodh karati hai, itni sunder kavita, ki shabd nahi,
आपका अत्यंत धन्यवाद Aradhana Rai जी !
रंगों के महापर्व होली की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (07-03-2015) को "भेद-भाव को मेटता होली का त्यौहार" { चर्चा अंक-1910 } पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद ! मयंक जी !
Onkar said…
सुन्दर रचना

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