160 : मुक्त-ग़ज़ल - इतनी तो मसर्रत दे ॥


इतनी तो मसर्रत दे ॥
अब ग़म की जा शामत दे ॥
बिक जाऊँगा मैं भी गर ,
मुँहमाँगी तू क़ीमत दे ॥
सब क़र्ज़ चुका दूँगा ,
दो रोज़ की मोहलत दे ॥
होने को तरोताज़ा ,
आराम की फ़ुरसत दे ॥
बोझ अपना सकूँ ढो ख़ुद ,
रब इतनी तो ताक़त दे ॥
(मसर्रत=ख़ुशी,जा=स्थान,शामत=मृत्यु,मोहलत=छूट)
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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