*मुक्त-मुक्तक : 671 - प्रेम-पंक में.......



उसके रूप-जाल में मन फिर 
फँसता ही जाता
प्रेम-पंक में हृदय कंठ तक 
धँसता ही जाता
श्वेत मोगरों, लाल गुलाबों, 
पीले चंपों सा –
मुझसे जब वह मिलता औ खिल 
हँसता ही जाता
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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