नवगीत (28) - आग को पानी कब तक कहलवाओगे ?


पथ में पाटल नहीं ॥ 
पग में चप्पल नहीं ॥ 
मुझको काँटों पे कब तक
यों दौड़ाओगे ?
चाहे जल न सके
पर जलाता रहा ।  
आग से आग जल में
लगाता रहा । 
तुमने जो-जो भी चाहा
वो करता रहा ।
मैं कुओं से मरुस्थल
को भरता रहा ।
यों मैं निर्बल नहीं ॥ 
पर कोई कल नहीं ॥ 
क्या न जीवित पे थोड़ा
तरस खाओगे ?
कंटकित हार को
पुष्पमाला कहा ।
तेरे कहने पे तम को
उजाला कहा ।
झूठ का बोझ अब मुझको
यों लग रहा 
जैसे हिरनी को चट करने
सिंह भग रहा ।
बूंद भर जल नहीं ॥ 
फिर भी मरुथल नहीं ॥ 
आग को पानी कब तक
कहलवाओगे ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

सार्थक प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (23-02-2015) को "महकें सदा चाहत के फूल" (चर्चा अंक-1898) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
Pratibha Verma said…
बहुत सुन्दर ...
shashi purwar said…
bahut sundar navget hai gahare abhav ko vyakt karta hua sundar sarthak navgeet hardik badhai

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