नवगीत (25) - तुझको मैं ना पा सका कमबख़्त था ॥


तेरी पाकीज़ा मोहब्बत का मेरे –
पास हरदम ख़ास ताज-ओ-तख़्त था ॥
मरके भी करता रहा मुझको मोहब्बत बेपनाह ।
आग में जलते हुए भरता रहा तू सर्द आह ।
जानता था जबकि तू कुछ भी कहे बिन मर गया -
तुझको मेरी ही ज़रूरत, तुझको थी मेरी ही चाह ।
कुछ मेरी गफ़लत थी कुछ मेरा गुनह –
तुझको मैं ना पा सका कमबख़्त था ॥
जबकि कहने के लिए घुटता रहा दिन और रात ।
चाहकर भी कह न पाया था तू अपने दिल की बात ।
तू सुनाने के लिए बेचैन रहता था मगर
मैंने कहने का तुझे मौक़ा दिया कब ताहयात ?
जाने क्यों लेकिन हक़ीक़त में तेरे –
साथ में मेरा रवैया सख़्त था ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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