नवगीत (24) - माना है आज प्रेम - दिवस तो मैं क्या करूँ ?


माना है आज प्रेम - दिवस
तो मैं क्या करूँ ?
करता नहीं है कोई मुझसे
प्यार अभी तक ।
मैं भी नहीं किसी का
तलबगार अभी तक ।
ना मैं किसी का रास्ता
देखूँ नज़र बिछा –
ना है किसी को मेरा
इंतज़ार अभी तक ।
फिर किसलिए मनाऊँ जश्न
नाचता फिरूँ ?
ना आए उसका इंतज़ार
मेरी नज़र में ।
नादानी है इक तरफ़ा -
प्यार मेरी नज़र में ।
जिसका न अपना होना तय है
उसके वास्ते –
दिन – रात रहना
बेक़रार मेरी नज़र में ।
कोई मुझपे जब मरे न
मैं भी उसपे क्यों मरूँ ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

सार्थक प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (16-02-2015) को "बम भोले के गूँजे नाद" (चर्चा अंक-1891) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
Pratibha Verma said…
बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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