नवगीत : (23) - चिट्ठी भर लिखते रहते थे ॥


सुख-दुख सारे डूब-उतरकर
सब मन ही मन सहते थे ॥
प्रेम-बाढ़ में हंस-बतख से
दोनों सँग-सँग बहते थे ॥
मोबाइल का दौर नहीं था ।
मिलने का भी ठौर नहीं था ।
दिल की बातों को कहने का -
चारा कोई और नहीं था ।
इक-दूजे को चिट्ठी पर
चिट्ठी भर लिखते रहते थे ॥
ध्वनि का कोई काम नहीं था ।
जिह्वा का तो नाम नहीं था ।
भावों का सम्पूर्ण प्रकाशन –
गुपचुप था कोहराम नहीं था ।
आँखों के संकेतों से सब
अपने मन की कहते थे ॥
मिलते थे पर निकट न आते ।
वृक्ष-लता से लिपट न जाते ।
यदि पकड़े जाते तो सोचो –
जग से दण्ड विकट न पाते ?
इक-दूजे को दृष्टिकरों से
बिन छूकर ही गहते थे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Shiv Raj Sharma said…
बहुत ही सुन्दर सर
Shiv Raj Sharma said…
बहुत ही सुन्दर सर
सार्थक प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (15-02-2015) को "कुछ गीत अधूरे रहने दो..." (चर्चा अंक-1890) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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पाश्चात्य प्रेमदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद ! Shiv Raj Sharma जी !

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