नवगीत (22) - मन विक्षिप्त है मेरा जाने क्या कर जाऊँ ?


मन विक्षिप्त है मेरा 
जाने क्या कर जाऊँ ?
बिच्छू को लेकर 
जिह्वा पर चलने वाला ।
नागिन को मुँह से झट
 वश में करने वाला ।
आज केंचुए से भी मैं
 क्यों डर-डर जाऊँ ?
कुछ भी हो नयनों से 
मेरे नीर न बहते ।
यों ही तो पत्थर मुझको
 सब लोग न कहते ।
किस कारण फिर आज
 आँख मैं भर-भर जाऊँ ?
सच जैसे टपका हो 
मधु खट्टी कैरी से ।
अचरज ! पाया स्नेह- 
निमंत्रण जो बैरी से ।
हाँ ! जाना तो नहीं 
चाहता हूँ पर जाऊँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति  

Comments

सार्थक प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (14-02-2015) को "आ गया ऋतुराज" (चर्चा अंक-1889) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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पाश्चात्य प्रेमदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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