नवगीत (21) - मुझको मेरा लखनऊ दिल्ली


भूल विदूषक की भी हँसकर ,
मित्र उड़ाओ मत तुम खिल्ली ॥
सोची-समझी , देखी-परखी ।
मैंने तब जाकर है रक्खी ।
काली ,काली नागिन जैसी –
चूहे की रक्षा को बिल्ली ॥
तेरा तुझको श्याम श्वेत है ।
मेरा गमला मुझे खेत है ।
तुझको तेरी चींटी बिच्छू –
मुझको साँप है मेरी इल्ली ॥
माना तेरा नगर नियारा ।
मुझको मेरा गाँव पियारा ।
तेरी दिल्ली तो दिल्ली है –
मुझको मेरा लखनऊ दिल्ली ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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