नवगीत (20) - ठेस यदि मन को लगी.....


सत्य कहता हूँ उठाकर प्राणप्रिय की मैं शपथ –
ठेस यदि मन को लगी मेरी मरन हो जाएगी ॥
पीट लो जी चाहे जितना चर्म-कोड़ों से ।
फोड़ दो सर मोटे डंडों से या रोड़ो से ।
ऊँचे-ऊँचे पर्वतों से मुझको फिंकवा दो ,
रौंदवा दो बैलगाड़ी अथवा घोड़ों से ।
मेरे तन की वज्रता की देखलो करके परख –
मुझको कायागत हर इक पीड़ा सहन हो जाएगी ॥
तुझको हँसता देख होता हूँ सुखी मन में ।
तुझको रोता पाऊँ तो होता दुखी मन में ।
मैं हँसा करता सदा तुझको हँसाने को ,
कस-दबाकर कष्ट के ज्वालामुखी मन में ।
मुझको ठुकरा दे न होगा कोई पछतावा न दुख –
और को अपनाएगी तो फिर जलन हो जाएगी ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

वाह...बहुत खूब..."और को अपनाएगी तो फिर जलन हो जाएगी" वाह...
धन्यवाद ! राजेन्द्र अवस्थी जी !

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