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Showing posts from February, 2015

*मुक्त-मुक्तक : 676 - आती हो बिन झझक क्यों ?

चुप - चाप नहीं कंगन -  पायल बजा - बजा के ॥ आती हो बिन झझक क्यों ? आती नहीं लजा के ॥ क्या चाहती हो मुझसे ? क्यों बार - बार मेरे - एकांत में स्वयं को  लाती हो तुम सजा के ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 675 - न दिल अब निगोड़ा..........

न दिल अब निगोड़ा यहाँ लग रहा है ॥ न इतना भी थोड़ा वहाँ लग रहा है ॥ चले क्या गए ज़िंदगी से वो मेरी – मुझे सूना-सूना जहाँ लग रहा है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 674 - तेरे जलवों की..........

नहीं मेरे अकेले की  ये लाखों की  हजारों की ॥ तेरे जलवों की  तेरे दीद की  तेरे नज़ारों की ॥ बख़ूबी जानते हैं  तू कभी आया  न आएगा , सभी को है मगर  आदत सी  तेरे इंतज़ारों की ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 673 - सरे बज़्म मेरी बाहों में.........

सरे बज़्म मेरी बाहों में  आकर के झूम ले ॥ तनहाई में पकड़ के  मेरा हाथ घूम ले ॥ बेशक़ ! बशौक़ दे दे फिर  तू मौत की सज़ा , सिर्फ़ एक बार तह-ए-दिल  से मुझको चूम ले ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

नवगीत (28) - आग को पानी कब तक कहलवाओगे ?

पथ में पाटल नहीं ॥ पग में चप्पल नहीं ॥ मुझको काँटों पे कब तक यों दौड़ाओगे? चाहे जल न सके पर जलाता रहा ।   आग से आग जल में लगाता रहा । तुमने जो-जो भी चाहा वो करता रहा । मैं कुओं से मरुस्थल को भरता रहा । यों मैं निर्बल नहीं ॥ पर कोई कल नहीं ॥ क्या न जीवित पे थोड़ा तरस खाओगे? कंटकित हार को पुष्पमाला कहा । तेरे कहने पे तम को उजाला कहा । झूठ का बोझ अब मुझको यों लग रहा– जैसे हिरनी को चट करने सिंह भग रहा । बूंद भर जल नहीं ॥ फिर भी मरुथल नहीं ॥ आग को पानी कब तक कहलवाओगे? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 672 - आँखों में मेरी अश्क़ का....

आँखों में मेरी अश्क़ का दरिया भरा रहा ॥ ग़म का बग़ीचा दिल का हमेशा हरा रहा ॥ चाहा था ज़िंदगी गुज़ारूँ हँसके मगर हाय ! ज़िंदा रहा मैं जब तलक मरा–मरा रहा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : चुप्पी-ख़ामोशी-सन्नाटे............

क्या ये चुप्पी-ख़ामोशी-सन्नाटे  बात में बदलेंगे ? क्या ये मौत-क़यामत आख़िर  जीस्त-हयात में बदलेंगे ? क्या मेरा फ़ौलाद-सब्र भी  बच पाएगा गलने से ? क्या वह दिन आएगा जिस दिन  ये दिन रात में बदलेंगे ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

नवगीत (27) - वह मेरे दिल के क़रीब है ॥

बेशक़ ! यह लगता अजीब है ॥ वह करता है अपने मन की । कुछ कहते हैं उसको सनकी , कुछ उसको धुर सिड़ी पुकारें – वह मेरे दिल के क़रीब है ॥ नज़्म रईसाना सब उसकी । ग़ज़ल अमीराना सब उसकी । वह अदीब लिखता दौलत पर – मगर निहायत ही ग़रीब है ॥ सारे ही हथियार पकड़ता । जान हथेली पर ले लड़ता । लेकिन जीत कभी ना पाता – दुश्मन जो उसका नसीब है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

नवगीत (26) - अब न पथ में डाल बाधा ॥

अब न पथ में डाल बाधा ॥ ओखली में सिर न धरता । मूसलों से यदि मैं डरता । हो रहा है धीरे - धीरे । मेरा पूरा काम आधा ॥ उसको रटता हूँ मैं आकुल । मुझको वह दिन-रात व्याकुल । बन रहा मैं श्याम उसका – हो रही वो मेरी राधा ॥ जो किसी तक आ सका ना । कोई जिसको पा सका ना । जाने कैसे ? किन्तु मैंने – सच असंभव देव साधा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

नवगीत (25) - तुझको मैं ना पा सका कमबख़्त था ॥

तेरी पाकीज़ा मोहब्बत का मेरे – पास हरदम ख़ास ताज-ओ-तख़्त था ॥ मरके भी करता रहा मुझको मोहब्बत बेपनाह । आग में जलते हुए भरता रहा तू सर्द आह । जानता था जबकि तू कुछ भी कहे बिन मर गया - तुझको मेरी ही ज़रूरत, तुझको थी मेरी ही चाह । कुछ मेरी गफ़लत थी कुछ मेरा गुनह – तुझको मैं ना पा सका कमबख़्त था ॥ जबकि कहने के लिए घुटता रहा दिन और रात । चाहकर भी कह न पाया था तू अपने दिल की बात । तू सुनाने के लिए बेचैन रहता था मगर – मैंने कहने का तुझे मौक़ा दिया कब ताहयात ? जाने क्यों लेकिन हक़ीक़त में तेरे – साथ में मेरा रवैया सख़्त था ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : खेल खेल है इसको खेल ही रहने दो ॥

भावों के आवेश में भरकर बहने दो ॥ जिसको जो कहना है जीभर कहने दो ॥ क्रीड़ांगन को मत रणक्षेत्र बनाओ तुम , खेल खेल है इसको खेल ही रहने दो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

नवगीत (24) - माना है आज प्रेम - दिवस तो मैं क्या करूँ ?

माना है आज प्रेम - दिवस तो मैं क्या करूँ ? करता नहीं है कोई मुझसे प्यार अभी तक । मैं भी नहीं किसी का तलबगार अभी तक । ना मैं किसी का रास्ता देखूँ नज़र बिछा – ना है किसी को मेरा इंतज़ार अभी तक । फिर किसलिए मनाऊँ जश्न नाचता फिरूँ ? ना आए उसका इंतज़ार मेरी नज़र में । नादानी है इक तरफ़ा - प्यार मेरी नज़र में । जिसका न अपना होना तय है उसके वास्ते – दिन – रात रहना बेक़रार मेरी नज़र में । कोई मुझपे जब मरे न मैं भी उसपे क्यों मरूँ ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

नवगीत : (23) - चिट्ठी भर लिखते रहते थे ॥

सुख-दुख सारे डूब-उतरकर सब मन ही मन सहते थे ॥ प्रेम-बाढ़ में हंस-बतख से दोनों सँग-सँग बहते थे ॥ मोबाइल का दौर नहीं था । मिलने का भी ठौर नहीं था । दिल की बातों को कहने का - चारा कोई और नहीं था । इक-दूजे को चिट्ठी पर चिट्ठी भर लिखते रहते थे ॥ ध्वनि का कोई काम नहीं था । जिह्वा का तो नाम नहीं था । भावों का सम्पूर्ण प्रकाशन – गुपचुप था कोहराम नहीं था । आँखों के संकेतों से सब अपने मन की कहते थे ॥ मिलते थे पर निकट न आते । वृक्ष-लता से लिपट न जाते । यदि पकड़े जाते तो सोचो – जग से दण्ड विकट न पाते ? इक-दूजे को दृष्टिकरों से बिन छूकर ही गहते थे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

नवगीत (22) - मन विक्षिप्त है मेरा जाने क्या कर जाऊँ ?

मन विक्षिप्त है मेरा  जाने क्या कर जाऊँ ? बिच्छू को लेकर  जिह्वा पर चलने वाला । नागिन को मुँह से झट  वश में करने वाला । आज केंचुए से भी मैं  क्यों डर-डर जाऊँ ? कुछ भी हो नयनों से  मेरे नीर न बहते । यों ही तो पत्थर मुझको  सब लोग न कहते । किस कारण फिर आज  आँख मैं भर-भर जाऊँ ? सच जैसे टपका हो  मधु खट्टी कैरी से । अचरज ! पाया स्नेह-  निमंत्रण जो बैरी से । हाँ ! जाना तो नहीं  चाहता हूँ पर जाऊँ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 671 - प्रेम-पंक में.......

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उसके रूप-जाल में मन फिर  फँसता ही जाता ॥ प्रेम-पंक में हृदय कंठ तक  धँसता ही जाता ॥ श्वेत मोगरों, लाल गुलाबों, पीले चंपों सा – मुझसे जब वह मिलता औ’ खिल  हँसता ही जाता ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : बाज नतमस्तक.......

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एक चींटी से हुआ हाथी धराशायी ॥ शेर को चूहे ने मिट्टी-धूल चटवायी ॥ हारकर ख़रगोश लज्जित मंद कछुए से , बाज नतमस्तक चिड़ी की देख ऊँचाई ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

159 : मुक्त-ग़ज़ल - ना बने तो मत बना.......

ना बने तो मत बना पर और मत बिगाड़ तू ॥ मत फटे में और टाँग को अड़ा के फाड़ तू ॥ आड़ वाले काम आड़ यदि न मिल सके न कर , कुछ भी हो कभी न करना खोलकर किवाड़ तू ॥ बेचकर के घोड़े सो रही हैं भेड़-बकरियाँ , और थोड़ी देर मूक रह न सिंह दहाड़ तू ॥ मैंने मरुथलों में फ़सलें रस भरी उगाईं हैं , प्यास तू बुझाले चूस किन्तु मत उजाड़ तू ॥ अपनी भूल पे मैं लाज से गड़ा हूँ पहले ही , कर कृपा भरी सभा में मत पुनः लताड़ तू ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 670 - झूठे राजा हरिश्चन्द्र

लुंज केंचुए मेनकाओं को नृत्य सिखाते हैं ॥ झूठे राजा हरिश्चन्द्र को सत्य सिखाते हैं ॥ सूरदास इस नगर के वितरित करते-फिरते दृग , सदगृहस्थ को अविवाहित दांपत्य सिखाते हैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 669 - मुझमें क्या ख़ास है......

मुझपे क़ुर्बान है सौ-सौ दफ़ा फ़िदाई है ॥ मुझसे कौए से हंसिनी को आश्नाई है ॥ मुझमें क्या ख़ास है मुझको नहीं पता सचमुच , इतना तै है मेरी तक़दीर करिश्माई है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 668 - व्यक्ति अब लगभग.......

भावना की दृष्टि से अध-मृत हुए हैं ॥ व्यक्ति अब लगभग मशीनीकृत हुए हैं ॥ जन्म के कुछ एक नाते छोड़ सचमुच , स्वार्थ पर संबंध सब आधृत हुए हैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 667 - पैर तुड़वाकर भी बस चलते रहे

पैर तुड़वाकर भी बस चलते रहे ॥ तेल-बाती ख़त्म कर जलते रहे ॥ तेरी मर्ज़ी ,आग तेरी ,तेरे साँचे , लोह से हम मोम बन ढलते रहे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

नवगीत (21) - मुझको मेरा लखनऊ दिल्ली

भूल विदूषक की भी हँसकर , मित्र उड़ाओ मत तुम खिल्ली ॥ सोची-समझी , देखी-परखी । मैंने तब जाकर है रक्खी । काली ,काली नागिन जैसी – चूहे की रक्षा को बिल्ली ॥ तेरा तुझको श्याम श्वेत है । मेरा गमला मुझे खेत है । तुझको तेरी चींटी बिच्छू – मुझको साँप है मेरी इल्ली ॥ माना तेरा नगर नियारा । मुझको मेरा गाँव पियारा । तेरी दिल्ली तो दिल्ली है – मुझको मेरा लखनऊ दिल्ली ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

नवगीत (20) - ठेस यदि मन को लगी.....

सत्य कहता हूँ उठाकर प्राणप्रिय की मैं शपथ – ठेस यदि मन को लगी मेरी मरन हो जाएगी ॥ पीट लो जी चाहे जितना चर्म-कोड़ों से । फोड़ दो सर मोटे डंडों से या रोड़ो से । ऊँचे-ऊँचे पर्वतों से मुझको फिंकवा दो , रौंदवा दो बैलगाड़ी अथवा घोड़ों से । मेरे तन की वज्रता की देखलो करके परख – मुझको कायागत हर इक पीड़ा सहन हो जाएगी ॥ तुझको हँसता देख होता हूँ सुखी मन में । तुझको रोता पाऊँ तो होता दुखी मन में । मैं हँसा करता सदा तुझको हँसाने को , कस-दबाकर कष्ट के ज्वालामुखी मन में । मुझको ठुकरा दे न होगा कोई पछतावा न दुख – और को अपनाएगी तो फिर जलन हो जाएगी ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति