Saturday, February 28, 2015

मुक्तक : 676 - आती हो बिन झझक क्यों ?


चुप-चाप नाँह कंगन-पायल बजा-बजा के ॥
आती हो बिन झझक क्यों आती नहीं लजा के ॥
क्या चाहती हो मुझसे क्यों बार-बार मेरे -
एकांत में स्वयं को लाती हो तुम सजा के ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Thursday, February 26, 2015

मुक्तक : 675 - न दिल अब निगोड़ा


न दिल अब निगोड़ा यहाँ लग रहा है ॥
न इतना भी थोड़ा वहाँ लग रहा है ॥
चले क्या गए ज़िंदगी से वो मेरी –
मुझे सूना-सूना जहाँ लग रहा है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Tuesday, February 24, 2015

मुक्तक : 674 - तेरे जलवों की


नहीं मेरे अकेले की ये लाखों की हजारों की ॥
तेरे जलवों की तेरे दीद की तेरे नज़ारों की ॥
बख़ूबी जानते हैं तू कभी आया न आएगा ,
सभी को है मगर आदत सी तेरे इंतज़ारों की ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Monday, February 23, 2015

मुक्तक : 673 - सरे बज़्म मेरी बाहों में


सरे बज़्म मेरी बाहों में आकर के झूम ले
तनहाई में पकड़ के मेरा हाथ घूम ले
बेशक़ ! बशौक़ दे-दे तू फिर मौत की सज़ा ,
सिर्फ़ एक बार मुझको तहेदिल से चूम ले
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, February 22, 2015

गीत (28) - आग को पानी कब तक कहलवाओगे ?


पथ में पाटल नहीं ॥ 
पग में चप्पल नहीं ॥ 
मुझको काँटों पे कब तक
यों दौड़ाओगे ?
चाहे जल न सके
पर जलाता रहा ।  
आग से आग जल में
लगाता रहा । 
तुमने जो-जो भी चाहा
वो करता रहा ।
मैं कुओं से मरुस्थल
को भरता रहा ।
यों मैं निर्बल नहीं ॥ 
पर कोई कल नहीं ॥ 
क्या न जीवित पे थोड़ा
तरस खाओगे ?
कंटकित हार को
पुष्पमाला कहा ।
तेरे कहने पे तम को
उजाला कहा ।
झूठ का बोझ अब मुझको
यों लग रहा 
जैसे हिरनी को चट करने
सिंह भग रहा ।
बूंद भर जल नहीं ॥ 
फिर भी मरुथल नहीं ॥ 
आग को पानी कब तक
कहलवाओगे ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, February 21, 2015

मुक्तक : 672 - आँखों में मेरी अश्क़ का

आँखों में मेरी अश्क़ का दरिया भरा रहा ॥
ग़म का बग़ीचा दिल का हमेशा हरा रहा
चाहा तो ज़िंदगी को था हँसकर गुजारना ,
पर जब तलक जिया मैं मरा ही मरा रहा ॥
-डॉ हीरालाल प्रजापति 

Friday, February 20, 2015

मुक्तक : चुप्पी-ख़ामोशी-सन्नाटे............


क्या ये चुप्पी-ख़ामोशी-सन्नाटे 
बात में बदलेंगे ?
क्या ये मौत-क़यामत आख़िर 
जीस्त-हयात में बदलेंगे ?
क्या मेरा फ़ौलाद-सब्र भी 
बच पाएगा गलने से ?
क्या वह दिन आएगा जिस दिन 
ये दिन रात में बदलेंगे ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Thursday, February 19, 2015

गीत (27) - वह मेरे दिल के क़रीब है ॥


बेशक़ ! यह लगता अजीब है ॥
वह करता है अपने मन की ।
कुछ कहते हैं उसको सनकी ,
कुछ उसको धुर सिड़ी पुकारें –
वह मेरे दिल के क़रीब है ॥
नज़्म रईसाना सब उसकी ।
ग़ज़ल अमीराना सब उसकी ।
वह अदीब लिखता दौलत पर –
मगर निहायत ही ग़रीब है ॥
सारे ही हथियार पकड़ता ।
जान हथेली पर ले लड़ता ।
लेकिन जीत कभी ना पाता –
दुश्मन जो उसका नसीब है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Wednesday, February 18, 2015

गीत (26) - अब न पथ में डाल बाधा ॥


अब न पथ में डाल बाधा ॥
ओखली में सिर न धरता ।
मूसलों से यदि मैं डरता ।
हो रहा है धीरे - धीरे ।
मेरा पूरा काम आधा ॥
उसको रटता हूँ मैं आकुल ।
मुझको वह दिन-रात व्याकुल ।
बन रहा मैं श्याम उसका –
हो रही वो मेरी राधा ॥
जो किसी तक आ सका ना ।
कोई जिसको पा सका ना ।
जाने कैसे ? किन्तु मैंने
सच असंभव देव साधा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Tuesday, February 17, 2015

गीत (25) - तुझको मैं ना पा सका कमबख़्त था ॥


तेरी पाकीज़ा मोहब्बत का मेरे –
पास हरदम ख़ास ताज-ओ-तख़्त था ॥
मरके भी करता रहा मुझको मोहब्बत बेपनाह ।
आग में जलते हुए भरता रहा तू सर्द आह ।
जानता था जबकि तू कुछ भी कहे बिन मर गया -
तुझको मेरी ही ज़रूरत, तुझको थी मेरी ही चाह ।
कुछ मेरी गफ़लत थी कुछ मेरा गुनह –
तुझको मैं ना पा सका कमबख़्त था ॥
जबकि कहने के लिए घुटता रहा दिन और रात ।
चाहकर भी कह न पाया था तू अपने दिल की बात ।
तू सुनाने के लिए बेचैन रहता था मगर
मैंने कहने का तुझे मौक़ा दिया कब ताहयात ?
जाने क्यों लेकिन हक़ीक़त में तेरे –
साथ में मेरा रवैया सख़्त था ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, February 15, 2015

*मुक्त-मुक्तक : खेल खेल है इसको खेल ही रहने दो ॥


भावों के आवेश में भरकर बहने दो ॥
जिसको जो कहना है जीभर कहने दो ॥
क्रीड़ांगन को मत रणक्षेत्र बनाओ तुम ,
खेल खेल है इसको खेल ही रहने दो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, February 14, 2015

गीत (24) - माना है आज प्रेम - दिवस तो मैं क्या करूँ ?


माना है आज प्रेम - दिवस
तो मैं क्या करूँ ?
करता नहीं है कोई मुझसे
प्यार अभी तक ।
मैं भी नहीं किसी का
तलबगार अभी तक ।
ना मैं किसी का रास्ता
देखूँ नज़र बिछा –
ना है किसी को मेरा
इंतज़ार अभी तक ।
फिर किसलिए मनाऊँ जश्न
नाचता फिरूँ ?
ना आए उसका इंतज़ार
मेरी नज़र में ।
नादानी है इक तरफ़ा -
प्यार मेरी नज़र में ।
जिसका न अपना होना तय है
उसके वास्ते –
दिन – रात रहना
बेक़रार मेरी नज़र में ।
कोई मुझपे जब मरे न
मैं भी उसपे क्यों मरूँ ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Friday, February 13, 2015

गीत : (23) - चिट्ठी भर लिखते रहते थे ॥


सुख-दुख सारे डूब-उतरकर
सब मन ही मन सहते थे ॥
प्रेम-बाढ़ में हंस-बतख से
दोनों सँग-सँग बहते थे ॥
मोबाइल का दौर नहीं था ।
मिलने का भी ठौर नहीं था ।
दिल की बातों को कहने का -
चारा कोई और नहीं था ।
इक-दूजे को चिट्ठी पर
चिट्ठी भर लिखते रहते थे ॥
ध्वनि का कोई काम नहीं था ।
जिह्वा का तो नाम नहीं था ।
भावों का सम्पूर्ण प्रकाशन –
गुपचुप था कोहराम नहीं था ।
आँखों के संकेतों से सब
अपने मन की कहते थे ॥
मिलते थे पर निकट न आते ।
वृक्ष-लता से लिपट न जाते ।
यदि पकड़े जाते तो सोचो –
जग से दण्ड विकट न पाते ?
इक-दूजे को दृष्टिकरों से
बिन छूकर ही गहते थे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Thursday, February 12, 2015

गीत (22) - मन विक्षिप्त है मेरा जाने क्या कर जाऊँ ?


मन विक्षिप्त है मेरा 
जाने क्या कर जाऊँ ?
बिच्छू को लेकर 
जिह्वा पर चलने वाला ।
नागिन को मुँह से झट
 वश में करने वाला ।
आज केंचुए से भी मैं
 क्यों डर-डर जाऊँ ?
कुछ भी हो नयनों से 
मेरे नीर न बहते ।
यों ही तो पत्थर मुझको
 सब लोग न कहते ।
किस कारण फिर आज
 आँख मैं भर-भर जाऊँ ?
सच जैसे टपका हो 
मधु खट्टी कैरी से ।
अचरज ! पाया स्नेह- 
निमंत्रण जो बैरी से ।
हाँ ! जाना तो नहीं 
चाहता हूँ पर जाऊँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति  

Wednesday, February 11, 2015

*मुक्त-मुक्तक : 671 - प्रेम-पंक में.......



उसके रूप-जाल में मन फिर 
फँसता ही जाता
प्रेम-पंक में हृदय कंठ तक 
धँसता ही जाता
श्वेत मोगरों, लाल गुलाबों, 
पीले चंपों सा –
मुझसे जब वह मिलता औ खिल 
हँसता ही जाता
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Tuesday, February 10, 2015

मुक्तक : 670 - ( B ) - बाज नतमस्तक



एक चींटी से हुआ हाथी धराशायी ॥
शेर को चूहे ने मिट्टी-धूल चटवायी ॥
हारकर ख़रगोश लज्जित मंद कछुए से ,
बाज नतमस्तक चिड़ी की देख ऊँचाई ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Monday, February 9, 2015

159 : ग़ज़ल - ना बने तो मत बना.......


ना बने तो मत बना पर और मत बिगाड़ तू ॥
मत फटे में और टाँग को अड़ा के फाड़ तू ॥
आड़ वाले काम आड़ यदि न मिल सके न कर ,
कुछ भी हो कभी न करना खोलकर किवाड़ तू ॥
बेचकर के घोड़े सो रही हैं भेड़-बकरियाँ ,
और थोड़ी देर मूक रह न सिंह दहाड़ तू ॥
मैंने मरुथलों में फ़सलें रस भरी उगाईं हैं ,
प्यास तू बुझाले चूस किन्तु मत उजाड़ तू ॥
अपनी भूल पे मैं लाज से गड़ा हूँ पहले ही ,
कर कृपा भरी सभा में मत पुनः लताड़ तू ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, February 7, 2015

*मुक्त-मुक्तक : 670 - झूठे राजा हरिश्चन्द्र


लुंज केंचुए मेनकाओं को नृत्य सिखाते हैं ॥
झूठे राजा हरिश्चन्द्र को सत्य सिखाते हैं ॥
सूरदास इस नगर के वितरित करते-फिरते दृग ,
सदगृहस्थ को अविवाहित दांपत्य सिखाते हैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Friday, February 6, 2015

मुक्तक : 669 - मुझमें क्या ख़ास है


मुझपे क़ुर्बान है सौ-सौ दफ़ा फ़िदाई है ॥
मुझ सरिस काग से हंसी को आश्नाई है ॥
मुझमें क्या ख़ास है मुझको नहीं पता लेकिन ,
सच है क़िस्मत तो करिश्माई मैंने पाई है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Thursday, February 5, 2015

मुक्तक : 668 - व्यक्ति अब लगभग मशीनीकृत


भावना की दृष्टि से अध-मृत हुए हैं ॥
व्यक्ति अब लगभग मशीनीकृत हुए हैं ॥
जन्म के कुछ एक नाते छोड़ सचमुच ,
स्वार्थ पर संबंध सब आधृत हुए हैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Wednesday, February 4, 2015

मुक्तक : 667 - पैर तुड़वाकर भी बस चलते रहे


पैर तुड़वाकर भी बस चलते रहे रे ॥
तेल-बाती ख़त्म कर जलते रहे रे ॥
तेरी मर्ज़ी ,आग तेरी ,तेरे साँचे ,
लोह से हम मोम बन ढलते रहे रे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Tuesday, February 3, 2015

गीत (21) - मुझको मेरा लखनऊ दिल्ली


भूल विदूषक की भी हँसकर ,
मित्र उड़ाओ मत तुम खिल्ली ॥
सोची-समझी , देखी-परखी ।
मैंने तब जाकर है रक्खी ।
काली ,काली नागिन जैसी –
चूहे की रक्षा को बिल्ली ॥
तेरा तुझको श्याम श्वेत है ।
मेरा गमला मुझे खेत है ।
तुझको तेरी चींटी बिच्छू –
मुझको साँप है मेरी इल्ली ॥
माना तेरा नगर नियारा ।
मुझको मेरा गाँव पियारा ।
तेरी दिल्ली तो दिल्ली है –
मुझको मेरा लखनऊ दिल्ली ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, February 1, 2015

गीत (20) - ठेस यदि मन को लगी.....


सत्य कहता हूँ उठाकर प्राणप्रिय की मैं शपथ –
ठेस यदि मन को लगी मेरी मरन हो जाएगी ॥
पीट लो जी चाहे जितना चर्म-कोड़ों से ।
फोड़ दो सर मोटे डंडों से या रोड़ो से ।
ऊँचे-ऊँचे पर्वतों से मुझको फिंकवा दो ,
रौंदवा दो बैलगाड़ी अथवा घोड़ों से ।
मेरे तन की वज्रता की देखलो करके परख –
मुझको कायागत हर इक पीड़ा सहन हो जाएगी ॥
तुझको हँसता देख होता हूँ सुखी मन में ।
तुझको रोता पाऊँ तो होता दुखी मन में ।
मैं हँसा करता सदा तुझको हँसाने को ,
कस-दबाकर कष्ट के ज्वालामुखी मन में ।
मुझको ठुकरा दे न होगा कोई पछतावा न दुख –
और को अपनाएगी तो फिर जलन हो जाएगी ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

ग़ज़ल : 285 - बदनसीब हरगिज़ न हो

चोर हो , डाकू हो , क़ातिल हो , ग़रीब हरगिज़ न हो ।। आदमी कुछ हो , न हो बस , बदनसीब हरगिज़ न हो ।। ज़िंदगी उस शख़्स की , क्या ज़िंदगी है दो...