अकविता : ( 7 ) - प्रशंसा


यद्यपि यह काम मुझे
अत्यंत चापलूसी पूर्ण लगता है
किन्तु जब कभी भी मैं
दृढ़ निश्चय करके
कुछ बोल ही देना ठान लेता हूँ
कि
शब्दों के
होंठ छोड़ने से ठीक पहले
बाँस हो जाती है उसकी दूब ,
दुग्धता हो जाती है डामर उसकी ,
लँगड़ा पड़ती है उसकी उड़ान ,
कंस हो जाता है उसका कृष्णत्व ।
मैं सच कहता हूँ
चाहे जिसकी शपथ उठवा लो
मैं प्रतिदिन
उसकी केवल प्रशंसा करना चाहता हूँ
तभी तो
अत्यंत कठिनाई से
रोक पाता हूँ अपने मुँह को
जो झड़ाने चला था पुष्प
अंगार उगलने से ।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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