Monday, January 19, 2015

*मुक्त-मुक्तक : 662 - क्या इसलिए कि.......


क्या इसलिए कि आस्माँ से औंधा गिरा हूँ ?
सब जिस्म पुर्जा-पुर्जा मगर टुक न मरा हूँ !
अपने ही आस-पास हैं मेरे मगर मुझे ,
क्यों लग रहा है दुश्मनों के बीच घिरा हूँ ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...