Sunday, January 18, 2015

*मुक्त-मुक्तक : 661 - बेकार है , ख़राब है


बेकार है , ख़राब है , बहुत ग़लीज़ है ॥
उसके लिए है सस्ती मुफ़्त जैसी चीज़ है ॥
बेशक़ नहीं हो मेरी ख़ुशगवार ज़िंदगी ,
मुझको मगर बहुत बहुत बहुत अज़ीज़ है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...