Wednesday, January 7, 2015

*मुक्त-मुक्तक : 657 - सिर बलाएँ अपने अनगिन...


सिर बलाएँ अपने अनगिन ढोएगा सच ॥
जो भी कुछ पाया है गिन-गिन खोएगा सच ॥
मन को मेरे जो दुखा सुख पा रहा वो ,
शीघ्र पछताएगा निसदिन रोएगा सच ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...