*मुक्त-मुक्तक : 657 - सिर बलाएँ अपने अनगिन...


सिर बलाएँ अपने अनगिन ढोएगा सच ॥
जो भी कुछ पाया है गिन-गिन खोएगा सच ॥
मन को मेरे जो दुखा सुख पा रहा वो ,
शीघ्र पछताएगा निसदिन रोएगा सच ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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