नवगीत (19) - सुख के कारागार से कर दो मुक्त मुझे

हाँ अपने अपराध मुझे स्वीकार्य सभी ,
ऐसा दण्ड दो हो पापों का क्षय जिससे ॥
सुख के कारागार से कर दो मुक्त मुझे ।
लौह-श्रंखला भार से कर दो युक्त मुझे ।
नख उखाड़ो, कीलें ठोंको, दागो, पीटो
और हँसो भीषण पीड़ा दे उक्त मुझे ।
ताकि करूँ ना फिर से ऐसा कार्य कभी ,
हो स्वतन्त्रता छिन जाने का भय जिससे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Popular posts from this blog

मुक्त-ग़ज़ल : 256 - मंज़िल

मुक्त-ग़ज़ल : 257 - मक़्बरा......

मुक्त ग़जल : 254 - चोरी चोरी