नवगीत (18) - तुझको पुस्तक सा पढ़ा है रे


क्यों तेरी अनुपम छटा का आर्य ,
चित्र आँखों में मढ़ा है रे ?
जैसे कोई भक्त रामायण ।
सह-हृदय करता है पारायण ।
पाठ्यक्रम की मैंने इक अनिवार्य
तुझको पुस्तक सा पढ़ा है रे ॥
कोसता हूँ क्यों सतत वह क्षण ?
जब हुआ तुझ पर हृदय अर्पण ।
प्रेम मेरा तुझको अस्वीकार्य –
पर तेरा मुझ सिर चढ़ा है रे ॥
ढाल का सुंदर मेरी कण-कण ।
तू ही करता था मेरा यों पण ।
क्यों हुआ अब मैं तुझे परिहार्य ?
तूने ख़ुद मुझको गढ़ा है रे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुन्दर
धन्यवाद ! Lekhika 'Pari M Shlok' जी !

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