158:मुक्त-ग़ज़ल-मशहूर को जहां से गुमनाम बना डाला


मशहूर को जहां से गुमनाम बना डाला ॥
ऊगी सुबह को ढलती हुई शाम बना डाला ॥
मैकश असर तो तेरी सोहबत दिखा के मानी ,
मुझ मै-अदू को भी मै-आशाम बना डाला ॥
लतियाता न मुझे तू तो फल्ली-चना ही रहता ,
तेरी ठोकरों ने काजू-बादाम बना डाला ॥
पूनम की चाँदनी था ,बरगद की छाँव था मैं
तुमने भरी दुपहरी का घाम बना डाला ॥
हालात ने वो करवट बदली कि क्या बताएं ?
सीता के राम को राधेश्याम बना डाला ॥
( मैकश=शराबी ,मै-अदू=मदिरा-शत्रु ,मै-आशाम=मदिरा-प्रेमी ,घाम=धूप )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

सार्थक प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (12-01-2015) को "कुछ पल अपने" (चर्चा-1856) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
Kavita Rawat said…
समय समय की बात ..जाने कौन कब मशहूर हो और कब गुमनाम ...बढ़िया प्रस्तुति .

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