157 : मुक्त-ग़ज़ल - मुझसे फिर अपना दिल लगा दे आ ॥


मुझसे फिर अपना दिल लगा दे आ ॥
मिट रही ज़िंदगी बना दे आ ॥
गिर रहा हूँ मैं तेरी नफ़्रत से ,
कर मोहब्बत मुझे उठा दे आ ॥
तुझको मिलती है गर ख़ुशी इसमें ,
मुझको तड़पा मुझे सज़ा दे आ ॥
बेवफ़ा है बुरा है तो ज़ालिम ,
क़त्ल करके मेरा बता दे आ ॥
है अगर बेक़ुसूर तू तो फिर ,
कोई पक्का सुबूत ला दे आ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

मुक्त ग़ज़ल : 267 - तोप से बंदूक