नवगीत (15) : फिर अकेले में चलो ना ॥


प्रेम से यूँ मत तको ना ॥
सज-सँवर कर खण्डहर के –
फिर अकेले में चलो ना ॥
युक्ति कोई आज़माकर ।
फिर दुपट्टे को गिराकर ।
उसको शरमाकर उठाने –
सामने मेरे झुको ना ॥
बिन किये श्रंगार , बेढब ।
मुझसे टकराईं थीं तुम जब -
हड़बड़ी में जाने किसकी ?
ठीक फिर वैसी भिड़ो ना ॥
यदि न कह पाओ तो क्या डर ?
पेन-कागज़ फिर उठाकर ।
अपने मन का हाल सारा –
मुझको चिट्ठी में लिखो ना ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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