नवगीत (14) : व्यर्थ रहूँ उससे आकर्षित ॥


व्यर्थ रहूँ उससे आकर्षित ॥
जिसको पाना सूर्य पे जाना ।
भर बारिश में पतंग उड़ाना ।
जिसने मुझको स्वयं रखा है –
पाने से पहले आवर्जित ॥
क्यों सुंदर वह वज्र हृदय की ?
देखो लीला भाग्य समय की ।
जो मुझसे निर्लिप्त पूर्णतः –
मैं उसपे मन प्राण से अर्पित ॥
धन कुबेर वो रंक बड़ा मैं ।
मृदु उबटन वो पंक कड़ा मैं ।
मेल न मेरा उसका फिर भी –
मैं उससे मिलने उत्कंठित ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Kavita Rawat said…
सुन्दर ....
आपको नए साल 2015 की बहुत बहुत हार्दिक मंगलकामनाएं!
सार्थक प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (03-01-2015) को "नया साल कुछ नये सवाल" (चर्चा-1847) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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नव वर्ष-2015 आपके जीवन में
ढेर सारी खुशियों के लेकर आये
इसी कामना के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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