अकविता (13) - मेरे काव्य-कर्म का मूल उद्देश्य




औरों को पता नहीं क्या ?

किन्तु मेरे लिए

न जाने क्यों ?

किन्तु एक व्यसन है कविता ।

लिख लेने के बाद

मुझे असीम शांति मिलती है ।

इसका दूसरा कोई पाठक नहीं होता ।

मैं स्वयं पढ-पढ़कर आत्ममुदित होता हूँ ।

और हाँ

जो यह कहते हैं

यह फ़ालतू लोगों का   

एक फ़ालतू काम है

उन्हे सूचित हो

मेरी तो यह टाइम-पास की कमाई है ।

कैसे ?

मैं बिना नींद की गोली खाये

मात्र एक कविता लिखकर

घोड़े बेचकर सो जाता हूँ ।

इसी तरह तैयार हो रहा है

नशे-नशे में ,

मजे-मजे में ,

मेरे काव्य-संग्रह का माल ।

और एक दिन

छपेंगे एक के बाद एक

संग्रह पे संग्रह मेरे

जिन्हे बाटूँगा सबको

चाय नाश्ते के साथ

बिलकुल मुफ़्त में ।

पढ़ने के लिए नहीं ,

वैसे भी पढ़ता कौन है ?

घर ले जाकर सब पटक ही तो देते हैं

एक कोने में ।

निमंत्रण पत्रों की तरह -

पढ़लें तो पढ़ भी लें ।

एक बात तय है

मैं कवि तो हूँ ही

किन्तु मुझे कवि कहलाना भी है

अतः प्रकाशन-विमोचन के पश्चात

संग्रहों की मोटाई और संख्या के हिसाब से

मैं छोटे या बड़े कवि की संज्ञा पा ही लूँगा ।

यही तो मेरे काव्य-कर्म का मूल उद्देश्य है ।

मैं कोई फ़ालतू काम नहीं करता ।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति। वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं।
धन्यवाद ! राजेन्द्र कुमार जी !

Popular posts from this blog

मुक्त-ग़ज़ल : 256 - मंज़िल

मुक्त-ग़ज़ल : 257 - मक़्बरा......

मुक्त ग़जल : 254 - चोरी चोरी