Wednesday, January 21, 2015

अकविता (12) -मुझे सब उल्टा लगता है


मैं
वहाँ भी
अरे जिसका नाम तक लेने से
लोग डरते हैं
हर्ष पूर्वक
सदा सदा के लिए
चलने को ,
बसने को तैयार हूँ
क्या तो कहते हैं उसे ?
हाँ ! नर्क ।
क्योंकि मैं जानता हूँ
मेरा अनुभव है
सम्पूर्ण विश्वास है
मुझे सब उल्टा लगता है
जैसे -
तपन ठंडी ,
काँटे फूल ,
पीड़ा आनंद ,
जब तुम साथ होती हो ।
तो फिर निश्चय ही
क्यों न
नर्क भी स्वर्ग लगेगा ?
बोलो-बोलो !
अकेले नहीं ।
तुम्हारे बिन भी तो सब उल्टा लगता है
जैसे
ठंडी तपन ,
फूल काँटे ,
आनंद पीड़ा ।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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मुक्तक : 941 - बेवड़ा

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